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महात्मा गाँधीजी को मेरी श्रध्दांजलि

महात्मा गाँधी एक ऐसे नेता थे, जिन्होंने सत्य के आधार पर लोगों का नेतृत्व किया । उन्होंने जो दूसरों से कहा, वही खुद पर भी लागू किया । वे सच्चे लोकतांत्रिक नेता थे । उन्होंने अहिंसा की नीति पर चलकर भारत को स्वाधीनता दिलाई । उनका विश्वास था कि आग, आग से नहीं बुझाई जा सकती । आप ताकत का मुकाबला ताकत से नहीं कर सकते । आग बुझाने के लिये आपको पानी चाहिए । अहिंसा आतंकवाद की अग्नि को काबू करने के लिये पानी का काम करेगी ।

गाँधीजी ने अकेले भारत को ही नहीं बलकी अनेक अफ्रीकन देशों को भी अहिंसा के माध्यम से स्वाधीनता दिलाई । विश्व अब इसे अहिंसा की महान विजय के रूप में अनुभव करने लगा है ।

आज मेरे अपने देश में अहिंसा का सिध्दांत भुला दिया गया है । हम केवल मौखिक तौर पर महात्मा गाँधी सिध्दांतों की चर्चा कर शांति का नोबेल पुरस्कार पाना चाहते हैं, वह नोबेल जो महात्मा गाँधी को कभी नहीं दिया गया । मेरी राय में नोबेल की कोशिश की बजाय महात्मा गाँधी की नीतियों का अनुकरण करने पर बल देना चाहिए । वर्तमान में भारतीय राजनीतिज्ञ मीडिया की सहायता से वही पुरानी फ़ूट डालो और राज करो की नीति पर चल रहे हैं । जब भारत  को धर्म निरपेक्ष देश घोषित किया गया है तो धर्म या जाति नहीं पूछी जानी चाहीए । हर नागरिक को भारतीय की द्रष्टि से देखा जाना चाहिए, न कि मुन्नर, गुज्जर, हिंदू, मुसलमान आदि के रूप में ।

स्वदेशी आंदोलन को भूला दिया गया और विकास के नाम पर सरकार ने माँल्स खोलने की अनुमति दे दी। शायद सरकार ये बूल गई की ईस्ट इंडिया कंपनी भी इंग्लैंड से भारत व्यापार करने ही आई थी। कालांतर में उन्होंने भारत पर १५० वर्ष शासन किया। यही बात दोबारा होगी। इस बार धनी लोग आम आदमी को नियंत्रित करेंगे। जीवनमान महंगा और महंगा होता चला जायेगा, बलकी ये होना शुरु भी हो चुका है। जमीन कि किमते पिछले २-३ बर्स में २००% ते ३००% तक बढ गई है।

सरकार ने इसकी अनुमति क्यों दी? जमीन निर्मान नहीं की जाती, पैदा नही की जाती, फिर इसका मुल्य क्यों बढे? इसका कारण है बिल्डर्स का एकाधिकार। छोटे और मझोले बिल्डर्स ने व्यापार बंद कर दिया है और भवन निर्माण के क्षेत्र में अमीरों का एकाधिकार हो गया है। यही वजह है की जीवनमान, जीवन के लिये आवश्यक मूलभूत सुविधाओं की कीमत बढ गयी है। यही स्थिति माँल्स और सब्जी मंडियाँ खुलने से होगी। सरकार कहती है की सब्जी मंडियाँ और माँल्स खुलने से रोजगार बढेगा। पर इस प्रक्रिया मे वे जो बेरोजगारी खडी करेंगे, उसका निदान क्या है? सभी दुकानदार बेरोजगार हो जायेंगे। छोटे- छोटे सब्जी विक्रेता भी बेरोजगार हो जायेंगे।

खाने-पीने के सामान और कपडों भी कीमतें भी काफी बढ गयी हैं और अधिक बढेंगी।

आम आदमी की व्यथा से आहत महात्मा गाँधी राजघाट में अपनी समाधि के भीतर निश्चित ही रो रहे होंगे। वे निश्चित ही चर्चिल का वह कथन य़ाद कर रहें होंगे जिसमे उसने कहा था की भारत के नेता आपस में लढकर मरे्गे और देश को कई देशों में विभक्त कर देंगे। ये कथन आज सच सिध्द हो रहा है।

भारतीय स्वंय वे सब कर हैं, जो अंग्रेज भी कर सके। ये कडवा सच केवल भारतीयों के लिये नहीं बल्कि सारे विश्व के लिए लागू होता है। क्या आज कोई भी नेता मानवता, स्वाधीनता और जीवनमान की कीमत पर विचार करता है ? मेरी दृष्टि मे उत्तर है नही। सभी नेताओं ने देश की बात करना बंद कर मानवता की बात करनी चाहीए। न्युक्लिअर बम भविष्य का बम नही है, बल्कि भविष्य के बम पर्यावरण में आते परिवर्तन, ओजोन की परत और वैश्विक तापमान कि वृध्दि के रूप में दिखेंगे। कारखानोंसे उत्रा धुआँ, कारों और हवाई जहाजों का प्रदूषण पर्यावरण में काफी परिवर्तन ला चुका है। जिसे हम आज विकास कह रहे हैं वह भविष्य मे विनाश सिध्द होगा। सुरक्षा कि बजाय आम आदमी के कल्याण पर मदद खर्च की जानी चाहीए। याद रखें की पर्यावरण से पैदा हुआ क्लाइमेटिक बम न्युक्लिअर बम से अधिक खतरनाक है।

आम आदमी होने का अर्थ व्यक्ति विशेष न हो के उसके आत्मिक विचार और विचारों का चैतन्य है। उनके लिये ब्रह्मांड में घूम रहे है। किसीने उन विचारों को हासिल कर उनका नामकरण लोकतंत्र के रूप मे किया। पर भारत में लोकतंत्र का परिमार्जित रूप रामराज्य पहले से था। वैश्विक स्तर पर रामराज्य की स्थापना गाँधीजी की चाह थी। कविवर नरसी मेहता ने रामराज्य को अपनी कविता में परीभाषित किया हैं। गाँधीजी इसे हमेशा गाते थे।

वैष्णव जन तो तेने कहिए जे पीड पराई जाने रे अर्थात रामराज्य तभी लाया जा सकता है जब शासक आम आदमी की पीडा को समझें।


संकेत स्थ
के विकासक नोवेसिस टेक्नाँलाँजिज प्रा. लि. पुणे