मौलिकता

  उदेश्य

  प्रकाश

  श्रध्दांजलि

  याद्दच्छिक विचार

  यादगार व्यक्ती

  म्पर्क

 

1) एक शब्द, एक विचार,एक उदाहरण,एक मंत्र जो हम सबको साहस देता है,वह है ईश्वर।एक महक, एक गंध,एक सौरभ जो हम सबको साहस देता है वह है ईश्वर। एक उदात्त ओजस्वी नायक और उसकी धारणा जो साहस देती है वह है ईश्वर। लेकिन वही एक शब्द, एक उदाहरण, एक गंध सबको साहस नहीं दे सकता। अलग-अलग लोगों के लिए अलग-अलग शब्द,उदाहरण,कार्याकलाप,एवं गंध चाहिए। हमारे पूर्वजों को यह बात पता थी इसीलिए उन्होंने ईश्वर को अंनत,असीमित,असंख्य नाम दिए।

2) स्वतंत्रता की ओर जानेवाला रास्ता बहुत मुश्किल, दुर्गम है क्योंकि हम एक ऐसे संसार में रह रहे हैं जो समाज के बनाए नियमों पर चलता है। ऐसा समाज जो विकसन में नहीं,सकुंचन में विश्वास रखता है। इस समाज ने कुछ ऐसे झूठे जीवन-मूल्य बनाए हैं जिन्होंने समाज को दुर्बल बना दिया है। यह समाज व्यक्ति की स्वतंत्र रुप से सोचने की अनुमति नहीं देता। हर वह व्यक्ति जो एक नई सोच रखता है समाज द्वारा बहिष्कृत कर दिया जाता है। पर अगर आप इतिहास पढ़ें तो समझोगे कि वे लोग जो स्वतंत्र रुप से सोचते थे,उन्होंने दुनिया बदल दी। यही वे लोग हैं,जिन्होंने ईश्वर को पा लिया है। स्वतंत्र चिंतन आसान काम नहीं है। हर वह व्यक्ति जो स्वतंत्र चिंतन करता है अकेला हो जाता है या कहें कि समाज उसे अकेला कर देता है। इतना ही नहीं समाज ऐसे मनुष्य से डरने लगता है क्योंकि यदि हर व्यक्ति स्वतंत्र रुप से सोचने लगे तो समाज का मौलिक,मानसिक और आध्यात्मिक विकास बहुत त्वरित गति से होगा।आजतक संसार को मिले महान विचार व्यक्ति के मस्तिष्क की ही उपज हैं,न कि सामुदायिक मस्तिष्क की। समाज में व्यक्ति स्वातंत्र्य के बारे में बहुत कुछ कहा जाता है पर जब कभी भी व्यक्ति ने अपनी स्वतंत्रता का प्रयोग करने का प्रयत्न किया है समाज से उसे विरोध ही मिला है। लेकिन स्वतंत्र बुद्धिवाला व्यक्ति कभी भी समाज से नहीं डरता,क्योँकि उसे मालूम है कि व्यक्तियों का समूह ही समाज है,अन्यथा कुछ भी नहीं,उसका कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं हैं व्यक्ति की सत्ता है तो उसकी सत्ता है। इस संसार में कुछ अच्छा है न बुरा सिर्फ कर्म है जिसे हम अच्छे या बुरे का रंगीन चश्मा लगाकर देखते हैं, जिस दिन हम इस द्वैत भाव का रहस्य जान लेंगे ब्रम्हांड के अद्वैत रुप से हमारा साक्षात्कार हो जाएगा ।

3) मनुष्य की हर गतिविधि विकास की तरफ ही जाती है। पर विकास जितना आवश्यक है, उतना ही आवश्यक है कर्म। बिना कर्म के आत्म साक्षात्कार या भगवद् प्राप्ति संभव नहीं हैं,बिना उसके ज्ञान नहीं मिलता तथा बिना ज्ञान के जागरुकता नहीं आती। बिना जागरुकता के मनुष्य पशु मात्र ही होकर रह जाता है। क्योंकि जागरुकता ही एक ऐसा गुण है जो उसे पशुत्व से अलग करता है ।

4) हमारे देश में ईश्वर से साक्षात्कार करने के लिए चार प्रकार के योग का विधान है -

*  राजयोग-मन को एकाग्र कर उसी शक्ति की सहायता से साक्षात्कार प्राप्त करता है ।

*  ज्ञानयोग-ज्ञान के द्वारा यह साक्षात्कार कराता है ।

*  कर्मयोग-कर्म द्वारा भगवतप्राप्ति का मार्ग है।

*  भक्तियोग-में प्रेम द्वारा ईश्वर की प्राप्ति का रास्ता बताया गया हैं।

प्राथमिक अवस्था में योग के चारों प्रकारों का अभ्यास स्वतंत्र रुप से किया जा सकता है। किसी एक को चुनकर उसका अभ्यास करना संभव है। पर विकास की उन्नत अवस्था में साक्षात्कार के लिए चारों का एक साथ अभ्यास करना अनिवार्य हो जाता है। ज्ञान योग का प्रारंभ ज्ञान प्राप्ति से होता है पर उसके साथ-साथ ही और अधिक ज्ञान प्राप्ति की इच्छा बढ़ती जाती है और इसके लिए कर्म करना जरुरी हो जाता है,कर्म का एक फल तो वो है जिसका प्रभाव हमारे मन और भावनkओं पर तो पड़ता ही है दूसरों के मन पर भी पड़ता है जिससे हम जाने अनजाने दूसरों के मन और भावनाओं से भी जुड़ जाते हैं।अत:हमारे समक्ष यह स्पष्ट हो जाता है कि ज्ञान से कर्म और कर्म से आत्म साक्षात्कार होता है।तब हमें पता चलता है, कि ईश्वरीय प्रेम ही सबसे महत्वपूर्ण है। कर्म और ज्ञान के संयोग से जिस प्रसन्नता, प्रफुल्लता की सृष्टि होती है उसका कारण प्रेम है। प्रेम से ही उस आनंद की सृष्टि होती है जो राजयोग का लक्ष्य है। कर्म योग में पहले कर्म किया जाता है फिर इस तथ्य से साक्षात्कार होता है या यह ज्ञान मिलता है कि,प्रेम ही जीवन का मूलमंत्र है।

5) गतिहीनता के एक लंबे समय के बाद जीवन में कुछ उत्तेजना आई है।मुझे नहीं मालूम कि जीवन से मुझे क्या चाहिए?जीवन का क्या अर्थ है?क्या उद्येश्य है?क्या सही है ? क्या गलत?पर मैं इतना जानता हूँ कि मुझे इन प्रश्नों का उत्तर चाहिए। भौतिकता या विषय वस्तु से जुड़े प्रश्नों में अब मेरी कोई रुचि नहीं रह गई है क्योंकी मेरी रुचि अब मानवीय मस्तिष्क में है।मैं जानना चाहता हूँ कि क्या मनुष्य का दिमाग भी भौतिक या जड़ पदार्थों कि तरह है। एक सी परिस्थिति में क्या दोनों में एक ही प्रतिक्रिया होगी।पिछले कई दिनों में मैं इस बारे में काफ़ी चिंतित था।पर आज रात मैं बिल्कुल भी चिंता नहीं कर रहा हूँ ।मैं बहुत शांत होकर जीवन के बारे में विचार करने कि स्थिति में हूँ।मुझे लगता हैं और समझ में भी आता है कि मैं जीवन से भयभीत नहीं हूँ क्योंकि मैं अपने हर कर्म कि प्रतिक्रिया या फल भोगने के लिए तैयार हूँ।मुझे निष्क्रियता विशेष रुप से बुद्धि या मस्तिष्क कि बिल्कुल भी पसंद नहीं है।समाज द्वारा बनाए गए नियमों से प्रतिबद्ध होकर जीवन जीने से मनुष्य में एक गतिहीनता की स्थिति आ जाती है अत: उसे जीवन को उसके बृहद,रूप में समझने का पूरा अवसर नहीं मिल पाता।मनुष्य को संभ्रम में जीने की अवस्था की आदत पड जाती है और वह समझने लगता है,कि उसने जीवन को समझ लिया।पर क्या यह संभव है।हाँ,यदि आप में अनंत को समझने की शक्ति है तो आप जीवन को भी समझ सकते हैं। अब तक किसी भी ऐसे व्यक्ति से मेरी मुलाकात नहीं हुई है जो इस भ्रमित अवस्था से पूर्णतया बाहर निकल चुका है,जिसे समझ में आ गया हो कि सही है और क्या ग़लत या जीवन जीने का सबसे अच्छा तरीका कौन सा है? लेकीन इस प्रयोग का कूछ भी फल निकलता नज़र नहीं आता न ही मेरे प्रश्नों का उत्तर मिलता दिखता है।मेरे जीवन का पथ प्रदर्शन भी इससे नहीं होता दिखता।

बहुत पहले मैंने एक पुस्तक Human Roasting में पढ़ा था कि निरिक्षण के मापदंड बदलते ही दृश्य वस्तु भी बदल जाती है।और जिस प्रकार हर मनुष्य का मापदंड या दृष्टिकोण अलग होता है, जीवन के प्रति उसकि  दृष्टि भी अलग होती है।इसीलिए एक वस्तू के प्रति दो लोगों का नज़रिया एक सा नहीं हो सकता।यही नहीं यह मापदंड हर पल बदलता है और एक मनुष्य के लिए वही दृश्य वस्तू दूसरे पल कुछ और हो जाता है। मुझे एक वाक्य याद आ रहा है,जो जवाहरलाल नेहरु ने अपनी पुस्तक भारत एक खोज में लिखा था-भूतकाल मर चुका है।पर मैं इस से सहमत नहीं हूँ भुतकाल कभी मरता नहीं हर पल हमारे साथ चलता है,प्रगतिशील रहता हैहमारे साथ ही बदल भी जाता है,और हमारे वर्तमान एवं भविष्य का निर्माण करने में हमारी सहायता करता है (23-09-1972)

6) मुझे अपनी भावनाओं पर नियंत्रण रखना सीखना होगा।मैं जीवन के उस मुक़ाम पर पहुँच गया हुँ जहाँ यह बात साफ़ हो जाती है कि मनुष्य स्वयं ही अपना भाग्य विधाता होता है। एक सफल व्यक्ति बनने के लिए आपको अपने विचारों,भावनाओं आदि पर हर क्षण पूरा नियंत्रण रखना होगा।ज़रा भी ढील दी कि कहीं न कहीं आप अपना नुकसान ही कर लेंगे।

      यह कहा जाता है कि अनुभव ही सबसे बड़ा शिक्षक होता है अत: मैंने अपने आपको पूरी स्वतंत्रता दी कि मैं जीवन के अनुभवों से कुछ सीखूँ । पर मैंने पाया कि अपने आपको इतना मुक्त रखकर मनुष्य बहुत कुछ सीख और समझ सकता है पर अपने आप पर नियंत्रण खो देता है। बेतरतीबी से किया गया काम आदत बन जाता है और आप आदतों के गुलाम हो जाते हैं,फिर अपने आप पर काबू रखना बहुत मुश्किल हो जाता है। हर काम सोच विचार कर करना चाहिए बिना सोचे विचार काम करना पशु स्वभाव का द्योतक है मनुष्य का नहीं।इसलिए मुझे अपने आप पर पूर्ण नियंत्रण रखना सीखना होगा।मुझे अपना जीवन वैसे ही जीना चाहिए जैसे मैं चाहता हूँ तो मुझे हर वह प्रयत्न करना चाहिए जिससे मैं वह सब पा सकूँ जो मैं जीवन से चाहता हूँ ।

            त्याग तभी ठीक होता है जब आपने वह सब प्राप्त कर लिया है,जिसकी आप इच्छा रखते हैं।           संसार को आप तब तक नहीं छोड़ सकते जब तक संसार आपको नहीं छोड़ता।यदि आप गरीब हैं और कहते हैं कि मैंने धन का त्याग कर दिया हैं तो यह अर्थहीन है।यदि आप कहें कि आपने शराब नहीं पी,सिगरेट नहीं पी, जुआ नहीं खेला या ऐसा कोई भी काम नहीं किया जिसे संसार बुरा मानता है क्योंकि आपको अपने ऊपर नियंत्रण रखना आता है तो आप ग़लत हैं।यदि आपने सब कुछ किया-सीमा के अंदर रहकर तो कहा जा सकता है कि आप अपने ऊपर काबू रख सकते हैं। इन इच्छाओं को संयमित रुप से पूरा करें पर उनका दास न बनें उन पर ऐसे काबू करें जैसे एक घुड़सवार अपने घोड़े पर रखता है।तब कहा जा सकता है कि,आपने अपनी इंद्रियों को वश में कर लिया-है क्योंकि इंद्रिय सुख को छोड़ देना संयम नहीं है उनका संतुलन संयम है।वहीं मनुष्य गुणवान है जो इंद्रिय सुख को भोगकर भी उन पर संयम रखता है ।

मनुष्य अपना भाग्य स्वयं बनाता है। आपको भी यही करना चाहिए। सिर्फ़ पशु ही अपना भाग्य खुद नहीं बना सकते। अत:आप जीवन के जिस स्तर पर हैं उससे अपने आप को ऊपर ऊठाइये।अपने आप पर काबू रखिए।किसी की सहायता न लें क्योंकि अधिकतर लोग सहायता देने के बहाने यह जताते हैं वे आपसे बेहतर स्थिति में हैं।किसी की सहायता तब तक न करें जब तक आप वाकई सहायता नहीं करना चाहते हैं।और सहायता के बाद उसके बदले में कुछ भी न लें।कभी भी किसी से सहायता इसलिए नहीं करनी चाहिए कि आप उस से ऊँचे हैं।त्याग तो कभी करना ही नहीं चाहिए क्योंकि वह सबसे बड़ा दुर्गण है आप किसी के लिए कुछ करते हैं तो उसके बदले में कुछ आशा न रखें क्योंकि वह तो विनिमय होगा प्यार नहीं।किसी को प्यार करें तो इसलिए कि आप उससे प्रेम करते हैं,संसार के लिए सब कुछ छोड़ दें पर सिर्फ़ इसलिए कि आप ऐसा करना चाहते हैं किसी लालच के नहीं या कि संसार आपसे ऐसी आशा रखता है ।

तारीख 15/08/1967

            वह एक सुहानी सुबह थी,ठंडी मंद बयार बह रही थी।चिड़ियाँ मद्धम स्वर में गा रही थी।सूर्य मानों बादलों की झीने परदे के पीछे छिपा था।पूरा वातावरण एक ढके अच्छादित प्रकाश से भरा हुआ था।अचानक सूर्य इस पर्दे को हटाकर अपनी प्रभा बिखेरता हुआ बाहर आ गया लगा जैसे कि किसी सुंदर स्त्री ने अपने र्सौंदर्य को प्रकाशित कर दिया हो।पक्षी एक पल के लिए शांत हो गए पर तुरंत ही उल्लास से भरकर गीत गाने लगे मानो इस नए दिन का,नए प्रकाश का जिसने पूरे आकाश को दैदीप्यमान कर दिया और उन सब वस्तुओं को उजागर कर दिया जो छिपी हुई थी,स्वागत कर रहे हों ।

तारीख 08/03/1969

मनुष्य को ईश्वर बनने से सिर्फ़ एक चीज रोकती है वह है भय ।भय को जित लो तो तुम भी ईश्वर बन जाओगे ।

तारीख 09/07/1969

प्रकृति से घिरा रहना ऐसा ही है जैसे ईश्वर आपके चारों ओर हो।आज कोई भी राजनेता ऐसा नहीं है जिसमें ज़रा सी भी मानवीयता हो।सब में अपने देश या राज्य या समुदाय के प्रति पूर्वाग्रह है।मानवीय अधिकारों की रक्षा के लिए सोसायटियाँ बनी हुई हैं पर वे भी पक्षपात करती हैं। महात्मा गाँधी जैसे नेता कहाँ हैं जो पहले खुद काम करते थे बाद में लोगों को अपना अनुकरण करने के लिए कहते थे। वही असली नेता थे क्योंकि उन्होंने अपने जीवन के प्रयोगों से दृष्टांत दिए ताकि लोग उनके नेतृत्व में आगे बढ़ सके,यदि कभी किसी ने उनके आदेशों का पालन नहीं किया तो उन्होंने दूसरों की गलती का स्वयं उपवास कर प्रायश्चित्त किया ।

      पूना के ट्रैफिक में तभी सुधार आ सकता हैं जब सारे दंड हटा लिए जायें और सारे पहियों में छेद(पंक्चर)कर दिया जाये।सरकार ने आवश्यकता से अधिक नियम कानून बनाए हैं।नतीजा यह हुआ है कि कोई उसका पालन ही नहीं करता। कानून बने हैं उनका ठीक से पालन किया जाये।मैं बहुत हँसा था जब यह नियम बना था कि हेल्मेट पहनना ज़रुरी है।सरकार का ट्रैफिक पर कोई नियंत्रण नहीं है,लोग अपने मन से हर जगह सड़क पार करते हैं,गाड़ियाँ रेड सिग्नल पर भी चलती रहती हैं।इस तरीके के नियम भंग में सख्ती से पेश आना चाहिए क्योंकि ऐसा करनेवाले अपने से ज्यादा दूसरों को मारने की इज़ाजत दे रहे हैं पर उन्हें अपने आपको सुरक्षित रखने के लिए नियम बना रहे हैं।ट्रैफिक पुलिस को चाहिए कि वह पता करे कि कितनी सरकारी गाड़ियों के पास प्रदूषण को समाप्त करने में कितनी दिलचस्पी है।

      सरकार हर नागरिक को बताती है कि उसे सेल्स टैक्स रिटर्न हर महीने,हर तीसरे या साल में एक बार भरने चाहिए पर जब कोई डीलर सेल्स टैक्स कम चार्ज करता है तो बात साफ़ क्यों नहीं कि जाती कि वह बिक्री कर काम ले रहा है। डीलर सरकार का प्रतिनिधि है। वह सरकार को ही कर देता है अत:उसे इस से अवगत कराना या एक निश्चत टैक्स तय करना सरकार का कर्तव्य हो जाता है।

      कर्म और विज्ञान का उदगम एक ही है।स्वामी विवेकानंद ने कहा,कि कर्म कि उत्पत्ति दो चिजों से हुई।

1) प्रकृति पूजन

2) पूर्वज पूजन

  सारे पुराणों में देवतओं के नाम प्रकृति के तत्वों से आए हैं।हिंदू धर्म में इंद्र, वरुण,अग्नि आदि हैं तो यूनान में प्राकृतिक शक्तियों के नाम आए हैं। जयुस्त्र के अनुयायी अग्निपूजक हैं तो मिस्त्र में मृतकों को दवा लगाकर ममी के रुप में रखा जाता था।

      फिर स्वामी विवेकानंद ने कहा, हम इन दोनों का समन्वय कर इन्हें एक कर सकते हैंमनुष्य अपनी इंद्रीय सीमा को लाँघकर ऊपर उठना चाहता है।’’

      विज्ञान का उदगम भी इसीसे हुआ। मनुष्य ने मछलियों को समुद्र में तैरते देखा,तो उन्होंने नाव और जहाज़ों का निर्माण किया उड़ते हुए पक्षी हवाई जहाज़ों का प्रेरणा स्त्रोत बने ।

Human Resting नामक पुस्तक में लेखक कहता है- विज्ञान का आधार दो सिद्धात हैं-

1) अस्त-व्यस्तता में क्रम लाना।

2) पर्यवेक्षण का मापदंड बदलकर विषय-वस्तु को बदल देना ।

पहले नियम का उदाहरण Boyle’s how और Archimedes के सिद्धांत हैं।Boyle’s का नियम दबाव और आयतन के मध्य का संबंध तथा तापमान कैसे एक सा रखा जाये बताता है। लेकिन तापमान बदलते ही नियम भी बदलने लगता है।चूँकि तथ्य,असंख्य, अनंत विभिन्नतामय जीवनों की सृष्टि करते हैं ।

      ऊर्जा के संरक्षण का नियम कहता है कि,ऊर्जा की न तो सृष्टि होती है और न ही उसे नष्ट किया जा सकता है।सिर्फ उसका स्वरुप बदलता है जैसे संभाव्य ऊर्जा,गत्यात्मक ऊर्जा,चुंबकीय ऊर्जा,आदि।

      बाद में आइन्सटाइन ने एक नियम बनाया E=mc2.यह नियम ऊर्जा के साथ ठोस द्रव्य के संबंध को उजागर करता है।हिंदू धर्म में भी वही बात कहीं गई है और उस पूरी प्रक्रिया को पुनर्जन्म कहते हैं। जीवन कि न तो सृष्टि की जा सकती है और न नाश। वह सिर्फ़ रुप बदल लेता है।

      पिछले पन्नों में मैंने भगवत् गीता के एक श्लोक का उदाहरण दिया था। क्योंकि मैं इस शरीर में व्याप्त ब्रम्ह हूँ,वह अनश्वर जीवन जो कभी नष्ट नहीं हो्गा क्योंकि मैं सत्य हूँ और हूँ सदा रहनेवाला आनंद।’’

      ब्रम्ह से यहाँ अर्थ है आप ही ब्रम्हांड हैं, जिसे न बनाया जा सकता है न नष्ट किया जा सकता है आप अनंत हैं। जब आपका जन्म एक ऐंद्रिय शक्तिवाले शरीर के रुप में होता है तो,उस शरीर की सीमा में बाँधकर आप नश्वर हो जाते हैं।हम अनश्वर हैं पर नश्वर शरीर से बँधे हैं इसलिए हमारे अंदर एक सतत संघर्ष चलता रहता है इंद्रियों की सीमाबद्धता से ऊपर उठने का।आप अगर ध्यान दें तो देखेंगे कि आपकी सारी इंद्रियों को ठीक होते हुए भी बाह्य सहायता की ज़रुरत पड़ती है।

      देखने की वैज्ञानिक धारणा यह है कि किसी भी वस्तु का प्रकाश रेटिना से परावर्तित होता है और एक प्रतिबिंब बन जाता है इस प्रतिबिंब का संदेश दृष्टि तंत्रिकाओं से होकर मस्तिष्क तक पहुँचता है। मस्तिष्क इस प्रतिबिंब का विश्लेषण करता है और फिर हम उस वस्तु को देख सकते हैं। सुनने,चखने,सूँघने या छूने की प्रक्रिया भी कुछ ऐसी ही होती है कभी आपकी सभी इंद्रियाँ ठिक काम कर रही होती हैं फिर भी आप अपने विचारों में इतना खोए होते हैं कि न देखते हैं,न सुनते हैं,न महसूस करते हैं, न स्वाद लेते हैं, न ही घ्राण शक्ति का प्रयोग करते हैं ऐसा इसलिए है कि किसी और चीज़ को जानना महसूस करना अधिक आवश्यक लगता है और वह है ब्रम्ह।

      आप अनश्वर हैं। जब एक शरीर में आपका जन्म होता है तो आप फिर से नश्वर हो जाते हैं । जीवन को अनश्वर बनानेवाला संघर्ष एक बार फिर से शुरु हो जाता है।अमरत्व को प्राप्त करने के इस संघर्ष का नाम ही जीवन है। वास्तव में जीवन एक कैद है। मृत्यु स्वतंत्रता है इसलिए मृत्यु पर शोक नहीं करना चाहिए उत्सव मनाना चाहिए।

साधारणतया जब भी किसी देश में स्वतंत्रता संग्राम होता है तो किसी बड़े नेता का जन्म होता है।मुझे दूसरे देशों के बारे में तो पता नहीं अपने देश के बारे में ही लिख रहा हूँ।

      हमारे स्वातंत्र्य संग्राम को अमरीकी स्वातंत्र्य संग्राम से प्रेरणा मिली थी।

      ऐसे संघर्ष के दौरान हर देश में महान व्यक्ति जन्म लेते हैं,जैसे रामकृष्ण परमहंस। उनसे स्वामी विवेकानंद ने शिक्षा ली और शिकागो में होनेवाली धर्म-सभा में अपने भाषण से प्रसिद्ध हो गए। अमेरिका पहला देश था जिसने इस प्रकार की सभा की थी।मैं अमेरिका के साधारण नागरिकों से अपील करता हूँ कि हम सब संसार के साधारण लोग एक होकर पूरी दुनिया को एक देश बना दें और मानवता को एक सर्वमान्य धर्म।महान वैज्ञानिक जैसे जे.सी.बोस,सी.वी.रामन,महान लेखक जैसे रवीन्द्रनाथ टैगोर और प्रेमचंद, महान समाज सेवी जैसे राजा राममोहन रॉय,महान उद्योगपति जैसे टाटा,बिरला,महान् स्वतंत्रता सेनानी जैसे महात्मा गाँधी, लाला लजपतराय, बाल गंगाधर तिलक,सरदार वल्लभ भाई पटेल, राज गोपाल आचार्य,जवाहरलाल नेहरु आदि का जन्म हुआ । इन नेताओं ने कभी अपनी सुरक्षा का कोई उपाय नहीं किया क्योंकि वे निडर थे। उन्होंने कभी कोई तनख्वाह नहीं ली सिवाय कुछ विशेष सुविधाओं के सिवाय पं.नेहरु के अलावा कोई अपने परिवार को विरासत नहीं छोड गया। भविष्य के नेताओं के रुप में।मैं कुछ और उदाहरण देना चाहूँगा,जिन्होंने पिछड़े वर्ग के होते हुए भी सफलता की ऊँचाइयों को छुआ,जैसे जगजीवन राम,गुलज़ारी लाल नंदा, लालबहादुर शास्त्री, बाबासाहेब आंबेडकर आदि। ध्यान देने योग्य बात है कि,उस समय किसी प्रकार के आरक्षण की कोई सुविधा नहीं थी,चाहे वह कोई क्षेत्र हो,शिक्षा राजनिति या नौकरियाँ,उन लोगों ने जो प्राप्त किया अपनी गुणवत्ता के बल पर प्राप्त किया।इसीलिए इन सबका आधार सिर्फ़ गुणवत्ता और शिक्षा होना चाहिए।दान या मैनेजमेंट कोटा के आधार पर कोई सीट नहीं मिलनी चाहिए।अगर सरकार चाहती है कि पिछडे वर्गो की मदद करें तो उन्हें S.S.C. तक मुफ़्त शिक्षा दी जाये।उच्च शिक्षा के लिए स्कॉलरशिप दी जायें,ताकि उनके परिवारों पर यह पैसा बोझ न बन सके। लेकिन किसी भी किमत पर मेडिकल और इंजीनियरिंग कॉलेजों में आरक्षण नहीं होना चाहिए।

      शिक्षा का वास्तविक अर्थ होता है,अपने क्षेत्र में कुशलता प्राप्त करना और उसका जीवन में उसी प्रकार प्रयोग करना। पर आज की शिक्षा मानों सिर्फ़ अपनी गुणवत्ता के बल पर ऑर्डर लिया जा सकता है।

      उन सारे उम्मीदवारों को जो चुनाव में खड़े होते हैं अपना सारा इन्कम टैक्स रिटर्न भेजना चाहिए और अपनी चल-अचल संपत्ति का विवरण अखबार में छपवाना चाहिए ताकि जनता सब कुछ समझ सके।यदि उसे कोई संदेह हो तो उस संबंध में कोई कदम उठा सकें।

      वे सारे उम्मीदवार जो चुनाव जीतें उन्हें निष्पक्ष रुप से, बिना किसी भेदभाव के मुफ़्त काम करना चाहिए। उन्हें सिर्फ़ वह तनख्वाह और सुविधा लेनी चाहिएँ जो एक आम आदमी को मिलती हैं,लेकिन जब तक काम करने का माध्यम धन है,काम ईमानदारी से हो ही नहीं सकता। वास्तव धन काम करने की प्रेरणा नहीं बल्कि उसमें बाधक होता है ।

      न्याय और शिक्षा बहुत सुलभ होने चाहिएँ ताकि गरीबों को कम से कम खर्च में शिक्षा और न्याय प्राप्त हो सके ।

      मैं कुछ उदाहरण दे रहा हूँ जिनसे पता चलेगा कि,हमारे देश में न्याय कितना महँगा है।संजय दत्त, सलमान खान और राहुल महाजन के खिलाफ़ केस कब से चल रहे हैं। कहते हैं समय पर न्याय न मिलना न्याय,न मिलने बराबर ही होता है।पर इसका एक दूसरा पहलू भी है वह यह कि किसी साधारण मनुष्य के पास इतना धन कहाँ से आएगा कि वह इतने दिनों तक केस लड़ सकें।

      मैं चाहता हूँ कि लोग कोई काम करने से पहले कोई निर्णय लेने से पहले सोचें।ज़रा ध्यान दीजिए कि जब भी कोई खिलाड़ी,राजनितिज्ञ या फिल्मस्टार बीमार पड़ता है तो हम बिना किसी पूर्वग्रह के उसके लिए प्रार्थना करते हैं, पर क्या वह स्टार किसी भी वस्तु का विज्ञापन करने से पहले सोचता है कि इस वस्तु का उपभोग करने से जनता को क्या नुकसान होगा,उसी जनता को जिसने उसके लिए प्रार्थना की थी। सोचना तो दूर उसको इसका ख्याल तक नहीं आता क्योंकि वह उस वस्तु के बारे में कुछ भी नहीं जानता है।

      आतंकवाद तब तक समाप्त नहीं हो सकता,जब तक हम संसार से गरीबी को नहीं मिटाते और समता नहीं लाते।हमें किसी से उसका धर्म या देश नहीं पूछना चाहिए वरन् उस से मानो कि तरह बर्ताव करना चाहिए।

      गरीबी हटाने का सिर्फ एक तरीका है जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं को सस्ता बनाना।वे आवश्यकताएँ हैं-घर, खाने का सामान और कपड़े।वर्तमान स्थिति में ये सब चीजें केवल गरीबों ही नहीं वरन् मध्यम वर्ग के लिए भी महँगी हो गई हैं।पिछले एक साल में घरों के दाम 100 % प्रतिशत बढ़ गए हैं। और अनाज के 50% से 70% तक। यह समझ के बाहर की बात है कि वही जमीन पिछले साल के दामों से दुगने दामों में बिक रही है जबकि बिल्डर ने दोनों को एक समय में एक दाम में खरीदा था।क्या लेबर और रॉ मटेरियल के दाम इतने बढ़ गए हैं?और अगर ऐसा है कि माँग और आपूर्ति के नियम से ही मूल्य निर्धारण होता है तो सरकार को आगे बढ़कर इस पर रोक लगानी चाहिए।

ऐसे समय में राजनेता और प्रसिद्ध व्यक्ति क्या करते हैं। वे बड़े-बड़े बैनर लगाकर सोचते हैं कि शहर हरे-भरे हो जाएँगे, सड़कों की मरम्मत हो जाएगी और किसान आत्महत्या करना बंद कर देंगे।

      उन्हें लोगों से अधिक अपनी सुरक्षा एवं भलाई की चिंता रहती है ।

काम,व्यापार या रोज़गार के नैतिक नियम

      आप किसी भी क्षेत्र में हो,हर काम के कुछ नियम होते हैं। हिंदू धर्म में इन्हें स्वधर्म कहा गया है।मैंने यह वेबसाइट तब शुरु किया थाजब व्यापार बंद कर दिया था।यह मैंने इसलिए किया कि,नैतिकता के अभाव में मेरा दम घुट रहा था।मुझे मालूम नहीं कि लोग अपना स्वतंत्र  व्यवसाय क्यों करते हैं,पर मैंने ऐसा इसलिए किया कि मुझे अपने काम में पुर्ण स्वतंत्रता चाहिए थी जो दूसरे की नौकरी में संभव नहीं थी।अपना काम पूर्ण संतोष से भी नहीं कर पाता था।मैंने अपने आप से प्रश्न किया के पैसा कमाना ही सफल जीवन का मुख्य मापदंड है?जीवन का क्या उद्येश्य है यह सोचते-सोचते मैंने लिखना छोड़ दिया और टी.वी. खोला। ईश्वर ने मे्री सहायता कि।टी.वी.में एक समाचार आ रहा था कि स्वास्थ्य मंत्री ने कोला ड्रिंक्स में किटकनाशक दवा के खिलाफ एक एफिडेकिट कराया है।मेरे दिमाग में विचारों की एक श्रृंखला बनने लगी।यही काम अगर साधारण आदमी करता तो पुलिस कस्टडी में होता।

      पहले मैंने घरों के दाम 100 से 150% बढ़ने की बात की थी।मैंने इस बारे में बिल्डर्स से बात की वे कहने लगे कि यह माँग और आपूर्ति का नियम है। मेरे मन में एक भाव आया।पहले लोग सिनेमा का टिकट ब्लैक में खरिदते थे पर टिकट बेचनेवाले को सज़ा होती थी।तब यह नियम कहाँ था?

      आजकल के निर्माता अपनी चिजों का मूल्य निर्धारण उनकी संख्या पर करते हैं। अगर आप 100 चीजें खरीदते हैं तो आपको एक दाम मिलेगा 1000 पर दूसरा और 100000 पर और दूसरा। उनके लिए यह ठीक हो सकता है पर औरों के लिए और समाज के लिए बिल्कुल गलत है,एक नए व्यवसायी को व्यापार शुरु करने में इस से काफ़ी मुश्किल आ सकती है,क्योंकि उसकी खरीद की दर इस वजह से 15% से 20% प्रतिशत तक बढ़ जाती है । इस दशा में वह उस लोगों के साथ कैसे व्यापार कर सकता है जो पहले से इसमें हैं और जिनके पास काफ़ी पैसा भी है। इसके फलस्वरुप ऐसा होगा कि धनी और अधिक संपन्न हो जाएंगे और वे गरीब जिनमें क्षमता तो है पर जिनके पास साधन नहीं है अपना व्यापार नहीं शुरु कर पाएँगे।वास्तव में वस्तुओं के मूल्य उनके मूल दामों आकार पर ही निर्धारित होने चाहिएँ। इससे अधिक लोग व्यापार में आएँगे और निर्माता के लिए नए रास्ते भी खुलेंगे। फलस्वरुप ब्लैक मार्केटिंग भी कम होंगी।

३०/०७/२००७

महर्षि पतंजलि ने कहा है कि आप जो भोजन करते हैं वह माँस और रक्त में रुपांतरित होता है | ठीक इसी प्रकार हम जो शिक्षा ग्रहण करें, जो कुछ सीखें वह कर्म मूल्य (Work Ethics) के रूप में अधिष्ठित होना चाहिए | प्राचीन भारत मे ऋषि अपने विद्यार्थियों को वन में अपने आश्रम में शिक्षा दिया करते थे | उन्हें विभिन्न विषयों का ज्ञान उनके ही दैनिक जीवन के उदाहरणों द्वारा दिया जाता था | योद्धाओं को युद्ध के नीतिमूल्य (नीतिमत्ता) सिखाये जाते थे | उदाहरणार्थ उन्हें बताया जाता था कि युद्ध केवल दिन में ही करना है | उन्हें घर-परिवार के प्रति कर्तव्यों का ज्ञान भी कराया जाता था और माता-पिता एवं बच्चों की साज संभाल की शिक्षा भी दी जाती थी | उन्हें व्यापार और व्यापार की नीतिमत्ता भी सिखायी जाती थी | हर ज्ञान हर किसी को नहीं दिया जाता था |

ऋषि अपने छात्रों का अलग-अलग शिक्षा/ज्ञान के लिये चयन करते थे | ऋषि संपूर्ण ज्ञान केवल उन्हीं गिने-चुने शिष्यों को देते थे जिन्हें वे संबंधित क्षेत्र के लिए खरा चरित्र और नीतिमत्ता के प्रति श्रद्धा रखते थे | महाराजा उन दिनों ऋषियों से शासन और युद्ध पर राय लिया करते थे | राजा हमेशा अपनी समस्याएं ऋषियों के सामने ले जाते थे और उनकी सलाह के अनुरुप शासन करते थे |

महात्मा गाँधी अधुनिक समय के राजनेता थे | और एकमात्र ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने प्राचीन भारतीय तरीके से ज्ञान आत्मसात किया | उन्होंने अहिंसा की शक्ति से आम आदमी को जाग्रत किया और हमें स्वतंत्रता दिलाई | लोगों ने गाँधीजी की बातें हमेशा मानी क्योंकि उनमे प्रतिबद्धता थी और कथनी व करनी में अंतर नहीं था | यही नीति कई अन्य देशों ने भी आजादी हासिल करने के लिये अमल की |

आधुनिक युग में हम किसी भि व्यवसाय की नीतिमत्ता नहीं सिखा रहे हैं | हम विद्यार्थियों को बगैर उनका चरित्र परखे ज्ञान बाँट रहे हैं | आतंकवाद की जड में रोटी, कपडा और मकान का मंहगा हिते जाना और ज्ञान को आत्मसात नहीं कर पाना है | हर व्यवसाय आज केवल और केवल पैसा बनाने में यकीन रखता है इसलिए कि हमारे पास ऐसा कोई विश्वविद्यालय नहीं है जो कर्म मोओश्रल्ल्य या कार्य की नीतिमत्ता सीकाये | आज की शिक्षा बिकाऊ है और उसे खरीदकर आप समझ जाते हैं कि ये किस प्रकार की शिक्षा है | अधिकांश देश लोकतांत्रिक होने का दावा करते हैं पर वास्तविकता में कोई भी देश लोकतांत्रिक नहीं है | कोई भी आम आदमी के बारे में नहीं सोचता |

२७/१०/२००७

जब मैने ये वेबसाइत आरंभ की तो इसके उद्देश्य को लेकर मेरे मस्तिष्क में एक कच्चा या धुंधला सा खाका था | उस समय जो कुछ मेरे जेहन मे आता चला गया मैं उसे कागज पर उतारता चला गया |

अब मेरे सामने वेबसाइट का उद्देश्य एकदम स्पष्ट है | उद्देश्य है-आम आदमी को जगाना और उसमें ये समझ उत्पन्न करना कि दुनिया एक है | विश्व भर में आदमी समान है |

उन्हें ये समझ में आना चाहिए कि दुनिया का कोई भी राजनीतिज्ञ जनता में रुचि नहीं रखता | उनकी अभिरुचि पैसे और सत्ता मे है | यदि उनकी रुचि जनता में होती तो उन्हें न तो सुरक्षा की आवश्यकता होती, न ही वे जन विरोधी नीतियाँ बनाते | वे अपने-आपको लोकतांत्रिक बताते हैं पर दुनिया में कहीं भी लोकतंत्र नहीं है | यदि ऐसा होता तो अलग-अलग लोगों के लिए अलग-अलग कानून नहीं होते |

लोकतंत्र का अर्थ है जनता का, जनता के लिए, जनता द्वारा शासन | नेताओं को अपना जीवन लोंगों के सामने उदाहरण के रूप में रखना चाहिए | उनकी आय जनता की औसत आय जितनी ही होनी चाहिए | केवल मानवता में रुचि रखने वालों को ही चुनाव में खडे रहना चाहिए | नेताओं को वेतन और भत्ते इतने ज्यादा नहीं मिलने चाहियें, जितने अभी मिल रहे है | सभी बैंको से अनुबंध पत्र (एग्रीमेंट) एक जैसे हिने चाहिए, अलग-अलग बैंकों के अलग-अलग नहीं |

मैं जो अभिव्यक्त करना चाहता था, इस वेबसाइट के माध्यम से कर दिया | अब ये युवा वर्ग का कर्तव्य है कि वे विश्व में संपूर्ण लोकतंत्र लाने के तरीकों पर विचार करें |

 


संकेत स्थ
के विकासक नोवेसिस टेक्नाँलाँजिज प्रा. लि. पुणे