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क्य़ोंकि मैं ब्रम्ह हूँ,
इस शरीर में अमर जीवन,
जो कभी नष्ट नहीं होगा।
क्य़ोंकि मैं ही सत्य हूँ और हूँ अनंत आनंद।
यह भगवदगीता
के एक श्लोक
का अनुवाद है।
सत्यम-शिवम-सुंदरम
यह संस्कृत के एक सूत्र का अनुवाद है-
सत्यमेव जयते
मेरे देश भारत का जय घोष
सत्यम-शिवम-सुंदरम का अर्थ है,सत्य कठोर होता है,
पर सुंदर भी होता है। सत्यमेव
जयते का अर्थ होता है-विजय सत्य में ही है। लेकिन कोई एक भी ऐसा धार्मिक नेता
राजनीतिज्ञ नहीं है जो ऐसा सत्य बोल सके।
इसी कारण धार्मिक नेता
राजनीतिज्ञों की अलोचना नहीं करते हैं।मैं चाहता हूँ वह सब लिखूँ जो मेरे मन में तब
प्रकाशित होता है जब मैं ध्यान करने बैठता हूँ।
मैं इसे प्रकाश का प्रकटन इसलिए कहता हूँ कि इसकी जानकारी सबको है पर कोई उसे
अभिव्यक्त नहीं करता। जैसे पेड़ से सेब गिरते हुए तो बहुत से लोग देखते है पर किसी
ने न्यूटन के नियम के बारे में नहीं सोचा जबकि वह एक नई उदभावना न होकर विज्ञान का
एक आवश्यक नियम है।
मेरा
पहला वैज्ञानिक उदघाटन है कि राजनीतिज्ञ और आतंकवादी एक ही दल के सदस्य होते हैं।
1)
मैंने कहा हैं कि यह मेरा पहला प्राकट्य है और जल्दी ही मुझे इसका सबूत भी मिल गया।
जब अमरीकी राष्ट्रपति ने कहा कि अमेरिका ने इसलिए अफ़गानिस्तान और इराक़ पर हमला
किया क्योंकि वह ईश्वरीय आदेश था और जिहादी कहते हैं यही बात अल्लाह उनसे कहता है।
2) बच्चों को शिकारी न
बनाकर खिलाडी बनाना चाहिए। हमें खिलाड़ियों में शुद्ध प्रतियोगितात्मक स्पर्धा को
Sportsman Sprit
को बढ़ावा देना चाहिए और इसी
भावना से खेल खेलने चाहिए़।
पर हमारा संपूर्ण मीडिया जब
बार-बार खिलाड़ी से कहता है कि उसकी हार का कारण शिकारी मनोभाव अभाव है तो हम कहीं
न कहीं अपने बच्चों को शिकार की ओर धकेल रहे होते हैं।यह एक बड़ी विडंबना पूर्ण
स्थिती है कि एक ओर लगातार आतंकवाद को समाप्त करने की बात की जा रही हैं और दूसरी
ओर Killer Spirit
को बच्चों के खून में मिलाया जा रहा
है।
इस तरह आतंकवाद को रोका नहीं जा सकता।
क्या कभी आपने विश्वस्तरीय खिलाड़ीयों के चेहरों को ध्यान से पढा है?जब वे कोई
विकेट गिराते हैं या कोई गोल मारते हैं या उन्हें कोई पॉइंट मिलता है तो उनके चेहरे
पर कैसा ही भाव होता है जैसा एक खूनी या आतंकवादी के चेहरे पर होता है। आइए, हम
अपने बच्चों को खिलाड़ी ही बनाएँ।
3)
आज मीडिया-मस्तिष्क बहुत
संकुचित हो गया है।मैं नाथानी स्टील-यार्ड के विज्ञापन बोर्ड पर लगे एक विज्ञापन
बोर्ड पर लगे एक विज्ञापन को पढ़ रहा है।
“महान
मस्तिष्क विचारों पर वाद विवाद करते हैं,औसत मस्तिष्क घटनाओं पर विचार-विमर्श करते
है् संकुचित छोटे से मस्तिष्क लोगों पर बहस करते हैं ।”
आप आज
किसी समाचार पत्र को उठाकर देखें,पाएँगे कि उनमें न तो घटनाओं पर न ही विचारों पर
कोई बातचीत होती है सिर्फ इस पर विवाद होते हैं कि लोगों ने क्या कहा है?
4) आज
संसार में कोई असली रुप में नेता नहीं है। सच्चे नेता को सुरक्षा की आवश्यकता नहीं
होती। उसकी जरूरत सिर्फ कायरों को होती है तब किस प्रकार की सरकार बनने की आशा कि
जा सकती है।
नेता
ऐसा होना चाहिए जो अपने जीवन में अपने सिद्धांतो पर अमल करता हो।मेरे दिमाग में
नेता के नाम पर सिर्फ एक नाम उभरता है वह है महात्मा गाँधी का। उनमें अपने
सिद्धांतों को जीवन की कसौटी पर परखने की हिम्मत थी। उन्होंने अपने जीवन में भी कभी
सुरक्षा की माँग भी नहीं की।
4)
संयुक्त राष्ट्रसंघ संसार का सबसे बड़ा संगठन है जिसकी स्थापना समता
और प्रजातंत्र की रक्षा के लिए हुई है। पर मेरी दृष्टि में यह असत्य है क्योंकि यदि
ऐसा होता तो सिर्फ पाँच देशों को वोटों का अधिकार क्यों मिलता?
5)
कभी किसी ब्रैंड मास्टर द्वारा बाज़ार में लाई गई चीज़ का प्रयोग न
करें क्योंकि ब्रैंड की ज़रुरत उसी स्थिती में पड़ती है जब या तो चीज में दम नहीं
होता कि उसकी बिक्री उसकी अपनी गुणवत्ता परम हो या फिर निर्माता ग्राहक को सस्ते
दामों का लाभ न देकर
Brand Master
को अधिक दाम देना पसंद
करता है।
6)
संयुक्त राष्ट्र अमेरिका कह रहा है कि देशों के मध्य व्यापार पर
प्रतिबंध हटा देना चाहिए। व्यापार खोल दिए जायेः मैं कहता हूँ, क्यों न हम थोडा और
आगे बढ़ें और व्यापार के साथ-साथ सीमाएँ भी खोल देः
7)
संसार का कोई देश पूर्णतया प्रजातांत्रिक नहीं है
।यह
सरकार जनता के द्वारा,जनता के लिए और जनता की नहीं है वरना ऐसा नहीं होता कि नेताओं
को सड़क पर से गुज़रने के लिए लोगों को रोक दिया जाता।
8)
शिक्षा के
क्षेत्र में हर जगह गड़बड़ है।
आजकल हम
बच्चों को नहीं सिखाते कि कैसे सोचा जायें,पर क्या सोचा जायें जो एक गलत तरीका है।
बच्चों को इस बात की छूट होनी चाहिए वे खुद सोचें और तय करें कि क्या सही है और
क्या ग़लत?
9) मेरे
विचार से सचमुच महान लोग हमें बड़ी हस्तियों से अधिक साधारण लोगों में मिल जाएँगे।
संक्षेप में हीरो ज़ीरो हो सकता है और ज़ीरो हीरो।
10)
संसार में शिक्षित लोग कुछ ही हैं बड़ी
संख्या ऐसे लोगों की जो सिर्फ साक्षर हैं।शिक्षा का अर्थ है जो कुछ थोड़ा बहुत
जानते हैं उसका पूर्ण और अच्छा उपयोग किया जाये। जैसे कि सिविल इंजिनियर को अच्छी
सड़कें बनानी चाहिएँ पर हमारे देश में कितनी अच्छी सड़कें हैं। उन्हें अच्छी सड़कें
बनाना आता है पर बनाते नहीं; सिर्फ हाइवे ही अच्छे बनाते हैं क्योंकि वहाँ मंत्री
आते हैः शहरों में सड़कें खराब ही होती हैं।क्या कोई कॉरपोरेटर या मंत्री अच्छी
सड़कें बनाने कि जिम्मेदारी लेता है? यह उत्तरदायित्व सिर्फ और सिर्फ उन्हीं लोगों
का है जो यह काम करते है। जब सरकार कोई ईमारत गिराती है तो नुकसान उस साधारण नागरिक
का होता है,जिसने घर ख़रीदा है।उन लोगों को सज़ा नहीं मिलती जिन्होंने बिना अनुमति
के ऐसी ईमारतें बनाईं जो अपनी मूल ड्रॉइंग जैसी नहीं हैं। मेरे विचार से कॉर्पोरेट
और बिल्डर को भी इसका दंड मिलना चाहिए।
11)
न्याय इतना
सुलभ और सस्ता हो कि वह हर साधारण नागरिक को मुहय्या हो सके।
12)
रुपये-पैसे
या मुद्रा का चलन संसार में वस्तु-विनिमय के विकल्प के तौर पर हूआ था।पर आज वह
संसार की,सबसे शक्तशाली इकाई बन चुका है।
पहले
समाज में लोगों की इज्जत उनके काम की वजह से होती थी पर आज वह इज्जत सिर्फ पैसे को
मिलती है ।
13)
एकस्व अधिकार
(Patent System)
एक प्रकार की मानसिक वेश्यावृत्ति है। पहले कोई भी ज्ञान का
Patent नहीं
कराता था। यदि उसकी(ज्ञान)
की कोई नकल करें तो भी बुरा नहीं,समाझा
जाता था।अपने विद्यार्थी जीवन में हम समता और प्रजातंत्र की बातें किया करते थे।वह
हमारा लक्ष्य हुआ करता था।पर आज वे सब बातें कहीं गुम हो गईं हैः किसी भी
प्रजातंत्र में नेताओं को विशिष्ट सुविधाएँ नहीं मिलती। हमारे देश में यदी नेता जा
रहा है तो ट्रैफिक रोक दिया जाएगा।
जब वे नेता बिजली या
टेलीफोन का बिल नहीं भरते तो उन्हें दंड दिया जाना चाहिए।
जैसे ही उनका कार्यकाल
समाप्त होता है उनके निवासस्थान खाली करवा लेने चाहिए़।
हर वह नेता जो चुनाव लड़ता है,उसे फ़ॉर्म भरने के पहले अपनी सम्पत्ति और आय का पूरा
ब्यौरा देना चाहिए। इतना ही नहीं इस ब्यौरे की पूर्ण जाँच भी होनी चाहिए। यह इसलिए
भी आवश्यक है क्योंकि नेता हमारे जीवन का एक आदर्श भावचित्र प्रस्तुत करते हैं । पर
यह सिर्फ एक कल्पना बनकर रह गया है ।
संसद के अधिवेशन के दौरान जब इन लोगों के असभ्य एवं अशोभनीय व्यवहार के कारण संसद
का वक्त ज़ाया होता है तब इन लोगों से उसका हर्जाना लेना चाहिए।
मंत्रियों को
शायद यह भी नहीं पता चलता कि उनको मिली प्राथमिकता के कारण कितनी गाड़ियाँ जो रुकती
है उनका कितना पेट्रोल बरबाद होता है।
पूणे में
जब एक मंत्री को रास्ता देने के लिए ट्रैफिक को रोका जाता है तब ऑटो का किराया
44/-रुपये से बढ़कर 66/- हो जाता है।यह समस्या सिर्फ मेरी नहीं है न मालूम कितने
वाहन रोके जाते हैं ज़रा कल्पना किजिए कि लोगों को इससे कितनी क्षति पहुँचती है।
मेरे ख्याल से इन मंत्रियों को न केवल इसका बल्कि इससे
होनेवाले पेट्रोल के नुकसान का
भी हर्जाना देना चाहिए।
16)
ज्यादातर बैंक कर्ज़ देते समय अनेक प्रकार के दस्तावेजों लिखित प्रमाणों की माँग
करते हैं पर जनता की सुरक्षा के लिए वे कोई दस्तावेज दें।यह सरकार का कर्तव्य है
कि, वह इसका प्रबंध करे कि, बैंक भी नागरिकों को इस प्रकार के दस्तावेज दे। नहीं तो
सरकार बैंकों की निर्देश ज़ारी करें कि जनता को होनेवाले नुकसान की पूर्ति बैंक
करें।
17)
यदि बैंक एकाऊंट खोलते समय इतने दस्तावेज लेता है तो उसका फ़र्ज बनता है कि वह देखे
कि चेकबुक ठीक प्रयोग हो रहा है या नहीं,और चेक बाउंस तो नहीं करते।यदि चेक बाउंस
करें तो
160/-
का दंड होना चाहिए। दूसरी बार बाउंस करने पर 500/- का तथा तीसरी बार भी यह हो तो
एकाउंट बंद कर देना चाहिए। अगर यह नहीं होता है तो एकाउंट ही गलत है।
18)
सरकार को बिल्डर्स और घर(फ्लैट) खरिदने वालों के लिए एक मानक एग्रीमेंट पत्र बना
लेना चाहिए जिस से दोनों को फायदा हो।
19) सरकार के कानून
मात्र को ध्यान में रख कर ही बनने चाहिए।
किसी
समुदाय या धर्म के प्रति उनमें पूर्वाग्रह नहीं होना चाहिए।
20) संयुक्त राष्ट्र
अमेरिका अपने आपको सबसे विकसित दृष्टिकोण वाला राज्य मानता है।वैचारिक
स्वतंत्रता,अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता उसके दो मूल आधार स्तंभ हैं।
पर यह स्वतंत्रता अपने
देश और अपने लोगों के घेरे में बँधी है। पर क्या प्रजातंत्र का अर्थ सिर्फ अमेरिकी
लोगों के लिए स्वातंत्र्य है सबके लिए नहीं?
वास्तव में उसकी कोई
सीमा नही होनी चाहिए।
अगर आण्विक
शस्त्रों पर प्रतिबंध लगाना है तो यह काम सबसे पहले अमेरिका में होना चाहिए।
बाबरी मस्जिद के
टूटने के बाद मैंने बड़ी गहराई से राजनैतिक एवं धार्मिक मामलों पर विचार किया है।
मुझे लगता है कि,उस धार्मिक राजनेताओं को जो संदेश जनता तक पहुँचाना चाहिए था वह यह
कि किसी भी मंदिर,मस्जिद या गिरजे को नष्ट नहीं किया जा सकता है,क्योंकि उसका एक
आध्यात्मिक अस्तित्व है जो अनश्वर है।
आप नष्ट कर सकते हैं तो
केवल उसकी बाह्य संरचना को, उसकी आत्मा को नहीं,
पर किसी राजनेता में इतनी हिम्मत नहीं,कि वह यह कह सकें क्योंकि उसका मुख्य
उद्येश्य देश को सँभालना नहीं,वोट इकट्ठे करना है।हाँ अगर आज महात्मा गाँधी होते तो
यह जरुर कह सकते थे।
जब मुंबई में
बाढ़ आई तब लोगों ने ही एक दूसरे की मदद की, कोई राजनेता या विशेष व्यक्ति आगे
बढ़कर नहीं आया।
जनता को यह याद
रखना होगा कि उन्हें ही एक दूसरे की सहायता करनी है और नेताओं की चिकनी चुपड़ीबातों
में नहीं आना है। मत देते समय भी अपने विवेक का प्रयोग करना चाहिए यह नहीं सोचना
चाहिए कि प्रत्याशी का समाज में क्या दर्जा है या उसके पास कितना धन हैं,मतदाता को
याद रखना चाहिए कि वह बिकाऊ नहीं हैँ।जो प्रत्याशी अपनी संपत्ति का पूरा विवरण न
दे,आयकर का फ़ॉर्म ईमानदारी से न भजे उसे मत नहीं देना चाहिए। मतदाता इस बारे में
आपस में विचार विमर्श करें और अगर उन्हें लगता है कि प्रत्याशी झूठ बोल रहा है तो
ऐसा इंतज़ाम करें कि उसे बिल्कुल वोट न मिले?
जब यह काम पूरी तरह से हो जाये जैसा बताया गया है इंजीनियर और ठेकेदार कौन है
ताकि अगर काम ठिक से नहीं हुआ है तो उन्हें उसकी सज़ा दी जा सके।
संकेत स्थळ
के
विकासक नोवेसिस
टेक्नाँलाँजिज प्रा. लि. पुणे
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